मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व हाड़ोती में स्थित राजस्थान का तीसरा बाघ संरक्षित क्षेत्र है जो कि हाड़ोती के चार जिलों — कोटा, बूंदी, चित्तौड़गढ़ और झालावाड़ में विद्यमान है। चारों ओर घने जंगलों से घिरा हाड़ोती क्षेत्र चम्बल, काली सिन्ध, पार्वती, परवन जैसी बड़ी व अनेक छोटी-छोटी सदावाही नदियों के कारण जल समृद्ध है। इन नदियों के किनारे कहीं ऊंचे पर्वत, कहीं गहरे खड्डे और बीहड़ जंगल हैं। मालवा पठार के पहाड़ी मैदान पर होने के कारण यहाँ कई पर्वत शृंखलाओं का निर्माण होता है जिसमें मुख्य पर्वत दरा या मुकुन्दरा हिल्स है।
यह रिजर्व कोटा के दक्षिणी भाग पर एक रेखाकारित (linear) वन क्षेत्र है जो चित्तौड़गढ़ में, भैंसरोडगढ़ अभयारण्य के पास स्थित श्रीपुरा गाँव से बाडोली होते हुए दक्षिण-पूर्वी दिशा की तरफ झालावाड़ के गागरोन में परवन और अहू नदियों के संगम तक विस्तृत है। यह वन क्षेत्र मुख्यतः दो समान्तर संकीर्ण रूप से 80 किलोमीटर की लंबाई में फैली पर्वतमाला के रूप में है। मुकुन्दरा हिल्स की समुद्र तल से औसत ऊंचाई 300 मीटर जो चाँद बावड़ी नामक स्थान पर 517 मीटर की उच्चतम ऊंचाई प्राप्त करता है। इन दोनों पर्वतमालाओं के बीच में सघन और सुन्दर वन हैं जो कभी शेर, बाघ, भालू, ढोल और तेंदुए के लिए जाने जाते थे। राजस्थान सरकार द्वारा इन घने जंगलों एवं वन्यजीवों को संरक्षित करने के लिए इन्हें वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया जिनको दरा और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य के नाम से जाना गया।
मुकुन्दरा का इतिहास — एक झलक में
मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व की पृष्ठभूमि में कोटा का अत्यन्त प्राचीन एवं गौरवशाली इतिहास छिपा है। इस क्षेत्र में आदिम युगीन बस्तियों का प्रसार चम्बल अथवा चर्मण्यवती नदी के किनारे हुआ जिससे मुकुन्दरा हिल्स को आदि मानव की शरणस्थली होने का गौरव प्राप्त हुआ। मुकुन्दरा की पहाड़ियों में बनी प्राकृतिक गुफाओं में आदिम युगीन मानव के कुछ शैल चित्र खोजे गये हैं जिनमें आदिम युगीन जीवन शैली को दर्शाया गया है साथ ही कई विभिन्न प्रकार के जीवों की आकृति भी उकेरी गई हैं। ये शैलचित्र युक्त गुफाएँ चम्बल किनारे पहाड़ियों, नारसिंही माताजी, जवाहर सागर बांध, गैपरनाथ, गराडिया महादेव, दरा और कोलीपुरा स्थित "डाकन का टोल" पर देखे जा सकते हैं। (Sharma, 2017: 45-46)
शैल चित्रों के अलावा रिजर्व में 5वीं शताब्दी की एक खंडहर संरचना, "भीम की चौरी" आज भी दारा के पास स्थित है। पुराणों के अनुसार यह स्थान पांडव नायक भीम का विवाह मंडप था। ब्रिटिश राजनैतिक अभिकर्ता और खोजकर्ता जेम्स टॉड के 1820 के दशक में इसका पता लगाने के पहले से ही यह एक खंडहर के रूप में मौजूद था। टॉड ने अपने एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान नामक पुस्तक में उल्लेख किया है कि 17वीं शताब्दी में कोटा के एक शासक ने इसके पास ही एक नई हवेली या कोठी बनाने के लिए इसके पत्थर का इस्तेमाल किया था। 1998 में, इस हवेली के परिसर में एक खोज के दौरान मकर प्रणाली के रूप में नक्काशी की गई एक आदिम युगीन आकृति मिली। (Narayan and Mankodi, 2010)
मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में ऐतिहासिक महत्व के कई किले भी शामिल हैं जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है गागरोन का किला। UNESCO विश्व विरासत गागरोन किला झालावाड़ से 10 किमी दूर काली सिंध नदी और आहु नदी के संगम पर स्थित है। तीन ओर से अहू और काली सिंध के पानी से घिरा हुआ यह एक जलदुर्ग है। किला विंध्य हिल रेंज की सीधी खड़ी चट्टानों पर एक पठार के पूरे खंड को कवर करता है। किले में तीन परकोटे हैं जबकि राजस्थान के अन्य किलों में दो ही परकोटे होते हैं। इसके दो प्रवेश द्वार हैं — एक पहाड़ी की तरफ खुलता है तो दूसरा नदी की तरफ। नदी के किनारे, 93.6 मीटर की ऊँचाई पर सीधी खड़ी पहाड़ी, गिध-कराई किले को दुर्गम बनाती थी जिसका निष्पादन (फाँसी का दंड) के लिए भी उपयोग किया जाता था। इस किले का निर्माण बारहवीं सदी में डोड परमार शासकों द्वारा करवाया गया था, जो बाद में खींची (चौहान) शासकों के शक्ति केन्द्र के रूप में विख्यात हुआ। (UNESCO Addendum, 2013)
विश्व विरासत होने के साथ ही ये दुर्ग हीरामन तोते के लिए भी जाना जाता है जिसे यहाँ गागरोनी तोता (Alexandrine parakeet — Psittacula eupatria) कहा जाता है। गागरोनी तोता पुराने समय में यहाँ हजारों की संख्या में पाए जाते थे जो अब अज्ञात कारणों से बहुत कम रह गए हैं।
कोटा शहर चंबल नदी के दाहिने किनारे पर राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है, जिसे हाड़ौती या हाड़ाओं की भूमि के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कोटा की स्थापना तत्कालीन बूंदी महाराज समर सिंह के पुत्र जेटसी द्वारा भील सरदार 'कोट्या' को 1264 के एक युद्ध में मार कर की गयी। कोट्या भील चंबल नदी के निकट स्थित अकेलगढ़ का शासक था जिसके किले के अवशेष आज भी उपस्थित हैं। जेटसी का पुत्र सुरजन कोट्या की वीरता से प्रभावित था तथा इस भीलों के राज्य का नाम कोटा रख दिया। संभवतः कोटा एक-मात्र नगर है जो किसी विजयी के स्थान पर पराजित व्यक्ति के नाम पर बना है। (Crooke 2018)
तत्कालीन कोटा राज्य बूंदी, जयपुर, मेवाड़, झालावाड़, टोंक और मध्य प्रदेश की रियासतों से घिरा हुआ था। यह सभी राजपूताना रियासतों के सबसे बड़े जंगलों में से एक था, जो 1900 के शुरुआती भाग में लगभग 3600 वर्ग किमी के क्षेत्र को आच्छादित किये हुए था। इन वनों में विभिन्न प्रकार के बड़े मांसाहारी जीव जैसे बाघ, तेंदुए, भालू, हाइना और भेड़िये शामिल थे। शाकाहारी वन्यजीवों में सांभर, चीतल, चौसिंघा, नीलगाय और जंगली सूअर भी इन वन खंडों में पाए गए थे। बोराबास विशेष रूप से चीतल समृद्ध होता था जहाँ कभी 500 से अधिक एक जगह पर देखे जाते थे। कोटा के आसपास काले हिरण और जंगली सुअर आम थे। (Singh & Reddy 2016)
प्राकृतिक सौन्दर्य और वन्यजीवों का स्वच्छन्द विचरण यहाँ के शासकों को आखेट के लिए आकर्षित करता था। लेकिन मालवा पठार से लगा हुआ दरा का विस्तृत पहाड़ी क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम क्षेत्र था। जिसको आसानी से केवल दर्रा की नाल (दरा) से होकर ही पार किया जा सकता था। चित्तौड़ से झालावाड़ जाने के लिए यह एकमात्र मार्ग था जो कि कोलीपुरा से 38 किलोमीटर दूर था। यह क्षेत्र कोटा रियासत के द्वितीय शासक राव मुकुन्द का पसंदीदा आखेट क्षेत्र था। राव मुकुन्द की इस क्षेत्र में अत्यधिक रुचि होने के कारण दरा की पहाड़ियों का नाम मुकुन्द दरा पहाड़ियाँ रख दिया गया था, जिसे कालांतर में मुकुन्दरा (मुकुन्दरा हिल्स) के नाम से जाना गया। टाईगर रिजर्व का नाम पहले राजीव गांधी टाइगर रिजर्व प्रस्तावित था लेकिन इसके मुख्यतः मुकुन्दरा हिल्स पर होने के कारण और दरा के ऐतिहासिक महत्व से प्रेरित होकर मुकुन्दरा हिल्स टाईगर रिजर्व रखा गया है।
राव मुकुन्द अकसर मुकुन्दरा हिल्स क्षेत्र में आखेट के लिए शिविर आयोजित किया करते थे तथा इस प्रयोजन हेतु राव मुकुन्द ने दरा में महल का निर्माण कराया। यह महल, दरा महल या शिकारगाह के नाम से जाना जाता है जिसे प्रायः जानकारी के अभाव में कई लोग अबली मीणी का महल समझते हैं। अबली मिणी का महल दरा महल से कुछ दूर पहाड़ी पर राव मुकुन्द सिंह द्वारा खैराबाद की रहने वाली उनकी ख्वास अबली मिणी के लिए बनवाया गया था।
मुग़ल बादशाह जहाँगीर द्वारा दरा के क्षेत्र (तत्कालीन खैराबाद के निकट) में सन् 1605 से 1627 ईस्वी के बीच एक शिकार शिविर के पास सड़क पर 14 सैंडग्राउस, 3 हेरोन, नीलगाय आदि के शिकार का वर्णन तुज़्क-ए-जहाँगीरी में किया गया है। उसी शिविर के दौरान बादशाह ने घिरी गाँव के पास एक बब्बर शेर के होने की खबर पाकर शिकार किया। जैसा कि बब्बर शेर की बहादुरी को स्थापित थी, बादशाह उसकी आंतों को देखना चाहता था तथा उन्हें निकाले जाने पर पाया कि अन्य जानवरों के विपरीत शेर के पित्ताशय उनके जिगर के भीतर थे। बादशाह जहांगीर को लगा शायद शेर इस कारण से साहसी होते हैं, जबकि असलियत में शेर के पित्ताशय अन्य जानवरों के समान ही होते हैं। (Alexander Roger, 2016)
कोटा के कई लघु चित्रों में शेर और चीता शामिल हैं जो यहाँ इनके अस्तित्व को दर्शाते हैं। चित्रों के आधार पर, कोटा में 18वीं शताब्दी तक शेर थे। 1695-1707 ईस्वी की एक उत्कृष्ट तस्वीर में कोटा के महाराव राम सिंह I को मुकुंदरा में शेरों का शिकार करते चित्रित किया गया है। इस तस्वीर में राव राम सिंह I को चार महिलाओं के साथ मचान पर बैठा दिखाया गया है। (Anupama Thakur, 2009)
रामसिंह प्रथम ने दरा के पास ही वर्तमान रावठा गाँव में एक महल बनवाया था जो कि ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक अभिकर्ता कर्नल टॉड के अनुसार पिंडारियों के विरुद्ध युद्ध के समय अकसर उपयोग में लिया जाता था। उस दौरान यहाँ पर बहुत सघन जंगल थे जिसकी वजह से कालांतर में इस महल को शिकारगाह के रूप में विकसित किया गया। पूर्व में महल का नाम महाराव राम सिंह के नाम पर रामठा महल था परंतु कालांतर में इसे रावठा महल के नाम से जाना जाने लगा।
राव रामसिंह ने इस महल के पास ही दो पहाड़ियों के बीच एक पक्का बाँध बनाकर एक तालाब का भी निर्माण कराया था, जिसे रामसागर के नाम से जाना जाता है। इस तालाब के भीतर एक जनाना तथा एक मर्दाना दो शिकार मालाओं का निर्माण कराया गया था। ये शिकारमाले दर्शाते हैं कि उस समय महिलायें भी शिकार में रुचि रखती थीं तथा महाराज के साथ आखेट पर जाया करती थीं।
उस जमाने में इस रामसागर से एक पक्का धौरा (नाली) भी बनवाया गया था, जिससे आस-पास के क्षेत्र में सिंचाई के लिये पानी लिया जाता था। इसके अलावा झामरा, बेवड़ा तलाई, गड्ढे का माला, करौंदी कंजार के माले भी शिकार के लिए बनवाए गए शिकारमालों में शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल के दौरान कोटा रियासत में 150 शिकारमाले हुआ करते थे जहाँ से वे प्रतिवर्ष 4-5 बाघों का शिकार किया करते थे। (Singh & Reddy, 2016)
शेवदर गंगेयाजी द्वारा चित्रित एक तस्वीर में महाराज दुर्जन साल और जसवंत सिंह को एक सुंदर हरे-भरे जंगल में शेर के परिवार देखते हुए दर्शाया गया है जो एक शेर परिवार के साथ उनकी मुठभेड़ को दर्शाता है। 1784 में जोशी हथुवा की एक पेंटिंग में अलनिया के जंगलों में महाराज उम्मेद सिंह प्रथम (1771-1819) को शिकार करते हुए दिखाया गया है। (Anupama Thakur, 2009)
कोटा के जंगलों में ढोल (जंगली कुत्ते) भी पाए जाते थे। इन जंगलों में इनको 1920 तक देखा गया जब महाराजा गंगा सिंह ने बोरबन (संभवतः बोराबास) में एक को देखकर अपनी डायरी में नोट किया, निश्चित रूप से तब भी यह दुर्लभ रहा होगा।
आधुनिक भारतीय शासक अपने शिकार में सैन्य टुकड़ी को भी शामिल किया करते थे जिससे उनकी सेना युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहे। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कोटा राज्य से ढेरों सैन्य टुकड़ी के शिकार में शामिल होने की गतिविधियों को जेम्स टॉड ने "A Species of Petty War" के रूप में चित्रित किया था। (Julie E. Hughes, 2009)
दरा हमेशा से बाघों का पर्यावास रहा है। 1950 तक कोटा के अधिकतर जंगलों में बाघ पाए जाते थे, जो शिकार के कारण कोटा से विलुप्त हो गए। प्रिया सिंह और डॉ जी वी रेड्डी की एक रिपोर्ट के अनुसार 1950-60 के दशक के दौरान हाड़ौती क्षेत्र में 100 बाघों का शिकार हुआ। 1960 के दशक तक बाघ सिर्फ दरा जैसे जंगलों तक सीमित रह गए, जिसके बाद आबादी घटती गई और 1984 में छीपाबड़ौद क्षेत्र में एक अवयस्क बाघ की स्थानीय शीर्षस्थ स्टेशन अधिकारी द्वारा तुरंत गोली मारकर हत्या करने के बाद लुप्त हो गई।
मुकुन्दरा के वन
शुष्क पर्णपाती वन, पहाड़ी इलाके, घाटियाँ और नदी-नाले इस क्षेत्र में समृद्ध जैव विविधता को बनाए रखते हैं। बारिश के दिनों में, काले और सफेद ढोंक के पेड़ पहाड़ियों को हरियाली देते हैं। शुष्क ग्रीष्मकाल में, पलाश और सेमल अपने फूलों की लाल आभा देकर आकर्षक छटा प्रदान करते हैं। तेंदू, पीलू, गुरजन, महुआ, बील, करैया, बबूल, अमलताश, जामुन, पीपल, बरगद, नीम, इमली आदि के पेड़ इस वन क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में हैं। अर्जुन और कदंब भी नम स्थलों और धाराओं में पनपते हैं।
मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के वन को तीन प्रमुख प्रकारों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है।
उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन — ये उप आर्द्र और अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वनों में प्रमुख वृक्ष हैं सफेद धौंक (Anogeissus latifolia), पलाश (Butea monosperma), बांस (Dendrocalamus strictus), तेंदू (Diospyros melanoxylon), कदम्ब (Mitragyna parviflora) और असान (Terminalia alata)।
मिश्रित शुष्क पर्णपाती वन — शुष्क पर्णपाती वन एक साथ 70% से अधिक भू-भाग पर स्थित हैं जिनमें धौंक (Anogeissus pendula), Terminalia की कई प्रजातियों और दूधी (Wrightia tinctoria) शामिल हैं।
स्क्रब वन — इस प्रकार के वनों का विस्तार तुलनात्मक रूप से कम दिखाई देता है जिसमें Acacia senegal, A. leucophloea, Capparis decidua, C. sepiaria, Dichrostachys cinerea, Euphorbia nerifolia, Mimosa hamata आदि शामिल हैं।
| वन का प्रकार | प्रमुख प्रजातियाँ (वानस्पतिक नाम) |
|---|---|
| उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती | Anogeissus latifolia, Butea monosperma, Dendrocalamus strictus, Diospyros melanoxylon, Mitragyna parviflora, Terminalia alata |
| मिश्रित शुष्क पर्णपाती | Anogeissus pendula, Terminalia spp., Wrightia tinctoria |
| स्क्रब वन | Acacia senegal, A. leucophloea, Capparis decidua, C. sepiaria, Dichrostachys cinerea, Euphorbia nerifolia, Mimosa hamata |
मुकुन्दरा के वन्यजीव
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बाघ एक बार फिर से इस क्षेत्र में एक प्रमुख आकर्षण बन चुके हैं। बाघों के अलावा मुकुन्दरा अन्य वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है। यहाँ पहाड़ियों के बीच की घाटी, चंबल नदी के किनारे और ऊंचे पठारी हिस्से पैंथर्, स्लॉथ बियर्, भेड़िये, हाइना, जैकाल आदि वन्यजीवों को प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं। जबकि मैदानी इलाकों में चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, जंगली सूअर और खरगोश जैसे शाकाहारी जीव सभी मौसमों में देखे जा सकते हैं।
मुकुन्दरा के सावन भादों बांध में लगभग 80 मगरमच्छ वन विभाग ने छोड़े हैं। यहाँ कई प्रकार के शिकारी पक्षी देखे जा सकते हैं; यह माइग्रटोरी वल्चर का फीडिंग ग्राउंड है। यहाँ जंगली बिल्लियाँ (Felis chaus) भी आसानी से देखी जा सकती हैं।
मुकुन्दरा से पक्षियों की 225 से अधिक प्रजातियाँ अनुमानित की गई हैं। जिनमें कई प्रकार के शिकारी पक्षी, उल्लू, सारस क्रेन, पैराडाइज फ्लाई कैचर, इंडियन पिट्टा, विभिन्न प्रजातियों के पैराकीट, पृनिया, नाइटजार, स्टॉर्क बिल्ड किंगफिशर, और मुनिया आदि विशेष आकर्षण के केंद्र हैं।
गागरोन के पास स्थित लक्ष्मीपुरा और नोलाव के तालाब, गिरधरपुरा के छोटे और बड़े तालाब, श्रीपुरा का तालाब मुकुन्दरा के कुछ महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि के रूप में प्रवासी पक्षियों का पर्यावास बनाते हैं जहाँ सर्दियों में हजारों की संख्या में पक्षी देखे जा सकते हैं। इनके अलावा कडप का खाल में मगर और कछुए देखे जा सकते हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी लुप्तप्राय लॉंग बिल्ड वल्चर की कालोनी चंबल की लहरदार घाटियों में स्थित है। जिनको गैपरनाथ और गराडिया की कराइयों के पास आसमान में उड़ान भरते देखा जा सकता है।
बाघ संरक्षित क्षेत्र होने का सफर
दरा के वन क्षेत्र को मुकन्दरा टाइगर रिजर्व बनाने का सफर 1988 में तत्कालीन वन्यजीव उप वन संरक्षक विजय कुमार सलवान ने शुरू किया। इसे जवाहर सागर से जोड़कर विस्तृत राष्ट्रीय उद्यान बनाने की अवधारणा सलवान की थी। उनके कार्यकाल में इसका प्रारूप तैयार किया गया तथा राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा गया। उन्हें विश्वास था कि दरा हमेशा से बाघों का पर्यावास रहा है; उन्होंने अपने एक सहयोगी के साथ 1978 में दरा से बाघ के ट्रैक की सूचना दी। उन्होंने जयपुर तथा दिल्ली में विभाग के उच्चाधिकारियों के समक्ष प्रेजेंटेशन दिया। वन्यजीव बोर्ड को सहमत किया। संभवतः जिसके कारण 2004 में दरा को मुकन्दरा राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
कोटा के आम जनों का ध्यान मुकुन्दरा हिल्स के टाइगर रिजर्व बनने की संभावनाओं पर इक्कीसवीं सदी के शुरुआती कुछ वर्षों में केंद्रित हुआ जब उन्होंने एक अनजाने और अनचाहे मेहमान को अपने वन क्षेत्र में मृत पाया। उस समय किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि एक अनजान मेहमान उनके वनों की परिभाषा बदल देगा।
2002 में, जब रणथंभौर प्रबंधन रिजर्व से निकले एक बाघ को खोजने की कोशिश कर रहा था, तब दरा से खबर आई कि कुछ लोगों ने बाघ के पैरों के निशान देखे। पहले तो दरा में बाघ की मौजूदगी की संभावना को खारिज कर दिया गया था, लेकिन पगमार्क के सबूत मौजूद थे। 15 जुलाई 2003 को एक दिल दहला देने वाले दृश्य ने इस रहस्य को सुलझा दिया जब रात में एक बाघ ट्रेन की चपेट में आने से दरा रेलवे ट्रैक के पास मृत पाया गया। उस मृत बाघ की पहचान उस समय नहीं हो पाई थी; वन विभाग उसे मध्य प्रदेश से आया हुआ बाघ बता रहा था। वहीं दूसरी ओर रणथंभौर से निकला बाघ अभी तक लापता था।
ब्रोकन टेल — वह बाघ जिसने इतिहास बदला
पूरी कहानी आखिरकार अप्रैल 2005 में सामने आई, जब वन अधिकारियों ने रणथंभौर के लापता बाघ 'ब्रोकन टेल' की तस्वीर का मिलान मृत बाघ की तस्वीर से किया। दरा में पाया गया मृत बाघ 'ब्रोकन टेल' ही था — यह स्थापित हो चुका था। 'ब्रोकन टेल' रणथंभौर से 140 किमी की दूरी तय करके यहाँ पहुँचा था।
वह घटना आज भी कोटा के वन्यजीव सलाहकार रवींद्र सिंह तोमर की आँखों में सुस्पष्ट है। इन्होंने ही उस ऐतिहासिक चित्र को कैद किया था जिसने बाघ का दुखद अंत दिखाया। मुकुन्दरा हिल्स को राज्य का तीसरा बाघ अभयारण्य बनाने में उस तस्वीर का अहम योगदान है।
इस दुर्घटना में 'ब्रोकन टेल' की मृत्यु के बाद बाघों के जीवन की ऐसी समस्याएँ सामने आईं जिसके बारे में किसी ने कभी नहीं सोचा था — बाघों को अधिक स्थान और आसपास के बाघ परिदृश्यों (Tiger Habitat) के साथ संयोजकता (Corridor) की आवश्यकता है। वन विभाग ने इस तथ्य को स्थापित किया कि 'ब्रोकन टेल' ने कोटा पहुंचने के लिए विभिन्न पहाड़ी मार्गों का उपयोग किया। फिल्म निर्माता कोलिन स्टैनफोर्ड जॉनसन द्वारा ब्रोकन टेल पर निर्मित एक डॉक्यूमेंट्री ने साक्ष्य एकत्र किए और साबित किया कि कोटा तक जाने के लिए बाघ ने पहाड़ी गलियारे का उपयोग किया। 'ब्रोकन टेल' द्वारा इस्तेमाल किया गया सटीक मार्ग हमेशा एक रहस्य रहेगा लेकिन एक अन्य बाघिन (T-35) इस संबंध में अधिक प्रकाश डालती है।
यह अकसर माना जाता है कि केवल बाघ ही रणथंभौर से बाहर निकलते हैं लेकिन इस मादा ने इस धारणा को गलत साबित किया। T-35 मूल रूप से रणथंभौर के गिलई सागर क्षेत्र से थी जो बाहर निकलकर कोटा-सुल्तानपुर क्षेत्र में दिसम्बर 2009 में पाई गई। यह बाघिन मार्च 2016 में खेवड़ा गाँव के पास मृत पाए जाने तक इस क्षेत्र में रही।
T-35 के बाद, रणथंभौर से एक और बाघ T-98 निकला जो आश्चर्यजनक रूप से सुल्तानपुर के जंगलों से होते हुए दरा पहुँचा। नियमित अंतराल पर बाघों का आना साबित करता रहा है कि यह इलाका बाघों के लिए उपयुक्त है जिसे सरिस्का, रणथंभौर, बूंदी और कोटा को मध्य प्रदेश से जोड़ने वाला एक बड़ा गलियारा (corridor) बनाया जा सकता है। मुकुन्दरा को रणथंभौर से कम से कम दो संभावित गलियारे जोड़ते हैं — एक इंद्रगढ़ के माध्यम से, लाखेरी, रामगढ़ विषधारी अभयारण्य, डाबी, जवाहर सागर अभयारण्य होते हुए, और दूसरा चंबल और कालीसिंध नदियों से गागरोन होते हुए दरा तक।
इन घटनाओं से प्रभावित होकर तथा रणथंभौर में बाघों की बढ़ती आबादी और मुकुन्दरा को रणथंभौर के एक उपग्रह कोर क्षेत्र के रूप में विकसित होने की क्षमता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने 9 अप्रैल 2013 को अधिसूचना जारी करके मुकुन्दरा को एक बाघ आरक्षित क्षेत्र घोषित किया। दरा अभयारण्य, जवाहर सागर अभयारण्य, और मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्रों को सम्मिलित करके यह देश का बयालीसवाँ टाइगर रिजर्व बना। जिसका कुल क्षेत्र 755.99 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 417.17 वर्ग किलोमीटर क्रिटिकल टाइगर हैबिटैट (कोर एरिया) और 342.82 वर्ग किलोमीटर बफर एरिया है। कोर एरिया दर्रा वन्यजीव अभयारण्य और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य को बनाया गया है। चार नदियाँ — चम्बल, काली सिंध, अहू और आमझर — इसकी सीमा निर्धारित करती हैं।
मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के गाँव
मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दायरे में गिरधरपुरा, दामोदरपुरा, लक्ष्मीपुरा, मशालपुरा, खरली बावड़ी, रूपपुरा, कोलीपुरा, दर्रा, भूखी, घाँटी, बगीचा, रोझड़ा तालाब, नारायणपुरा, अंबा रानी, नोसेरा समेत 14 गाँव हैं। ये कोटा के अलावा बूंदी, झालावाड़ व चित्तौड़गढ़ जिलों की सीमा में हैं। मुकुन्दरा के टाइगर रिजर्व बनने के बाद केंद्र सरकार ने इन गाँवों के विस्थापन की मंजूरी दे दी है जिसके अंतर्गत अभी खरली बावड़ी व लक्ष्मीपुरा को विस्थापित किया जा चुका है।
मुकुन्दरा के इन गाँवों के ग्रामीण गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं और अपने पशुधन — बकरियों, भेड़ों, और मवेशियों — पर जीवित रहने के लिए बहुत अधिक निर्भर हैं जो कि स्वाभाविक रूप से रिजर्व में अपार जैविक दबाव का कारण है। लोग विस्थापित होने को तैयार नहीं हैं क्योंकि अधिकतर ग्रामीणों को लगता है कि उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिल रहा।
मुकुन्दरा में दो महत्त्वपूर्ण रियासत कालीन गाँव भी हैं। गिरधरपुरा गाँव कोटा राज्य के बसने के पहले से अस्तित्व में है जो कि एक टकसाल हुआ करता था और यहाँ अदालत भी बैठती थी। आज भी गाँव में जगह-जगह प्राचीन मंदिर, बावड़ी और मकान देखे जा सकते हैं। यहाँ की आबादी बंदा गाँव से पुनर्वासित होकर स्थापित हुई है। राणाप्रताप सागर बांध के निर्माण के लिए इन्होंने बंदा गाँव छोड़ा था। यहाँ के बड़े और छोटे तालाब प्रवासी पक्षियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
दूसरा गाँव है मंदिर गढ़। इतिहासकार डॉ फिरोज अहमद के अनुसार इस गाँव को मालवा के शासक राजा नर बरमन ने बारहवीं सदी में बसाया और सैकड़ों मंदिर बनवाए इसलिए इसे मंदिर गढ़ कहा जाता है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इसका नाम महेंद्र भील के नाम पर महेंद्रगढ़ रखा गया था जो कालांतर में मंदिर गढ़ के नाम से जाना जाने लगा। इस गाँव में कभी 108 मंदिर हुआ करते थे जो मुग़ल शासकों द्वारा खंडित कर दिए गए। यहाँ स्थित शिव मंदिर और मूर्तियों के शिलालेखों पर लिखावटें मौजूद हैं। खंडित मूर्तियाँ जगह-जगह ज़मीन में गड़ी हुई देखी जा सकती हैं।
मुकुन्दरा में बाघों की वापसी
मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघों की वापसी के लिए दर्रा वन्यजीव अभयारण्य के दक्षिणी भाग में 82 वर्ग किलोमीटर की परिधि का एंक्लोज़र बनाया गया जिसमें बाघ को दो चरणों में छोड़ने की तैयारियाँ की गईं। जिसमें 28 हेक्टेयर के छोटे एंक्लोज़र में बाघ के सामान्य व्यवहार के संकेत दिखने पर बड़े एंक्लोज़र में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
वर्षों के इंतज़ार के बाद, मुकुंदरा को पहला बाघ 3 अप्रैल 2018 को रणथंभौर के बाघ RT-91, मिर्जा के रूप में मिला।